(1) मरीचि के पुत्र कश्यप प्रजापति थे। ब्रह्मदेव की दाहिनी हाथ की बोटे की नली से दक्ष नाम का पुरुष और बाएँ हाथ की बोटे की नली से धरनी नाम की स्त्री जन्मीं। उन दोनों से एक हज़ार-हज़ार महा ऋषि जन्मे। (2) ब्रह्मा के मानस पुत्रों में दूसरे स्थान पर रहने वाले अंगिरस्‍ु को उद्दध्य, बृहस्पति और संवर्त जैसे पुत्र हुए। बृहस्पति देवताओं के आचार्य बने। (3) मैत्रि (अत्रि) नामक मानस पुत्र से अनेक महा मुनि जन्मे। (4) पुलस्त्य नामक ब्रह्मा के मानस पुत्र से राक्षसों का जन्म हुआ। (5) पुलह नामक मानस पुत्र से किन्नर और किमपुरुष वर्ग उत्पन्न हुए। (6) क्रतू नामक मानस पुत्र से पक्षियों की जाति उत्पन्न हुई।

   
    

शान्तिपर्व (Mahabharat) - 13 अनुशासनपर्व


॥ श्रीः ॥
13.253. अध्यायः 253
अथ दानधर्मपर्व ॥ 1 ॥
Mahabharata - Anushaasana Parva - Chapter Topics
भीष्मेण युधिष्ठिरंप्रति दृष्टान्ततया विप्रकन्योपाख्यानकथनपूर्वकं विद्वत्संरक्षणस्य महाफलहेतुत्वकथनम्॥ 1 ॥
Mahabharata - Anushaasana Parva - Chapter Text

युधिष्ठिर उवाच।

कृपया परया प्रोक्तः सर्वेषां पापकर्मणाम्।
ज्ञानस्य च परस्येह तन्मे ब्रूहि पितामह॥ 13-253-1(91491)
भीष्म उवाच। 13-253-2x(7684)
उपायोऽयं परप्राप्तौ परमः परिकीर्तितः।
नारायणास्यानुध्यानमर्चनं यजनं स्तुतिः॥ 13-253-2(91492)
श्रवणं तत्कथानां च विद्वत्संरक्षणं तथा।
विद्वच्छुश्रूषणप्रीतिरुपदेशानुपालनम्।
स ध्यानेन जपेननाशु मुच्यते प्राकृतोपि वा॥ 13-253-3(91493)
जपश्चतुर्विधः प्रोक्तो वैदिकस्तान्त्रिकोपि च।
पौराणिकोथ विद्वद्भिः कथितः स्मार्त एव च॥ 13-253-4(91494)
विद्वच्छुश्रूषया ज्ञानं विद्वत्संरक्षणेन च।
नासाध्यं ज्ञानिनां किञ्चित्तस्माद्रक्ष्यास्त्वया द्विजाः॥ 13-253-5(91495)
सुव्रता बन्धुहीनैका वने पूर्वं यमेन तु।
आसीदाश्वासिता विद्वत्संरक्षणफलात्किल॥ 13-253-6(91496)
विप्रस्य मरणे हेतुस्तत्पत्नी पितृशोकदा।
वैश्या त्वमतिलाभोऽयं विप्रकन्येति साम्प्रतम्। 13-253-7(91497)
इत्युक्ताऽऽश्वासिताऽपृच्छत्केनैवं पापसंयुता।
जाता विप्रकुले सम्यक् श्रेयश्चापि ब्रवीहि मे॥ 13-253-8(91498)
यम उवाच। 13-253-9x(7685)
अन्यजन्मनि विद्वांसं प्रहारैरभिपीडितम्।
चोरशङ्काविमोक्षेण मोक्षयित्वा सुजन्मिका॥ 13-253-9(91499)
इत्युक्ताऽष्टाक्षरध्यानजपादिश्रेयसंयुता।
यमेनानुगृहीताऽभूत्पुण्यलोकनिवासिनी॥ 13-253-10(91500)
तन्नित्यं विदुषां रक्षा तत्परोऽभूर्महीपते।
तेषां संरक्षणात्सद्यः सर्वपापैः प्रमुच्यते॥ ॥ 13-253-11(91501)

इति श्रीमन्महाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि त्रिपञ्चशदधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ 253 ॥


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